धर्म से मेरा सामना 

#Translation #Hindi

You can read the original piece in English by Bharti Bansal titled ‘My Encounters with Religion as a Sikh Woman’ here.

सिख परिवार में पली-बढ़ी, लेखिका सिख धर्म से अपने परिचय के बारे में विवरण देते हुए संयोजित धर्म और व्यक्तिगत श्रद्धा के बारे में बात करती हैं।  

मैं डिप्रेशन, बॉर्डरलाइन पर्सनालिटी डिसॉर्डर और OCD से पीड़ित हूँ। मुझे समय-समय पर भगवान में विश्वास रखने को कहा गया है क्योंकि एक वही सहारा है जो मेरी टूटी नैया को अनिश्चितता और रोग के समंदर से तैरने में मदद कर सकते हैं। मेरा परिवार एक कट्टर अनुयायी नहीं है किन्तु हर मध्यम-वर्गीय परिवार की तरह भगवान में मानता ज़रूर है। 

मेरा मानना है कि धर्म लोगों द्वारा किसी भी समुदाय को समझने के लिए बनाया गया है और यह, किसी भी प्रथा की तरह, तब तक ही ज़िंदा रहता है जब तक इसका दुरुपयोग न किया जाए। पर तीन अरब देवताओंवाले इस देश में (मैं नहीं जानती यह गिनती कैसे की गई थी) हमारे पास निश्चित ही बहुत विकल्प हैं। यहाँ लोग एक अद्रश्य अस्तित्व की रक्षा करते हैं, जिसे न तो किसिने सुन है और न ही देखा है और उसके बारे में कहानियाँ बनाते हैं क्योंकि सच कहें तो, यह विचार बहोत एकाकी विचार है कि इस ब्रह्मांड ने सिर्फ़ हमें बनाया है और यह जगह साँझा करने के लिए और कोई नहीं है। 

मेरे घर में एक छोटा-सा लकड़े का घर है जिसमें गुटका साहिब, एक घंटी और एक दिया है जो कभी बुझता नहीं (वह इलेक्ट्रिक है)। मेरे पिता कुछ दिनों पर पाठ करते हैं और हम सब ईश्वर द्वारा लिखे सुंदर चिंतन से शोभित होती हैं, वह ईश्वर जिसकी मैंने सिर्फ़ कहानियाँ सुनी हैं। कुछ अवसरों पर मेरे पिता हमारे गुरुओं की वीरता की बात करते हैं जिसे हम सब बिना कुछ भी माने सुनते हैं। हम मिलेनियल्स हैं। हम कुछ ज़्यादा ही जागृत हैं भगवान में मानने के लिए लेकिन कभी-कभी जब चीजें हमारे नियंत्रण से पड़े लगती हैं, तब गुरुद्वारा या नज़दीक में कोई मंदिर ही ऐसी जगह है जहां हम जा पहुँचते हैं। 

धर्म राजनीतिक है। उसने देशों व सरकारों को आकार दिया है। उसने लोगों के जीवन को आकार दिया है। मेरे एक पीड़ित होने के बावजूद, ईश्वर के बारे में लोगों की राय ने मुझे भी आकार दिया है। ऐसे भी दिन होते हैं जबमेरे परिवार में इस बात को लेकर लंबी चर्चाएं होती हैं की कैसे भगवान असली हैं और उन्हें पक्की श्रद्धा से ढूँढना पड़ता है। पर यह मान्यता जो सबको एक करती है, यही धारणा समुदायों को विभाजित भी करती है।

शास्त्र हज़ारों वर्ष पूर्व लिखे गए थे और उन्हें ईश्वरीय दर्जा दिया जाता है जिसकी अवहेलना करने की हिम्मत कोई नहीं करता। लेकिन जब अमीन इसपे सोचती हूँ तो लगता है जैसे हम सब “हाउस ऑफ सीक्रेट्स” का भाग हैं जो एक नेटफ्लिक्स डाक्यूमेंट्री है बुरारी मौतों पर। एक बहुत बड़े पैमाने पर कट्टरपंथी, श्रद्धालु और अनुयायी होते हैं। धर्म के अंतर्गत पंथ विकसित हुए हैं जिसका लोग अंधवत् अनुसरण करते हैं, बिना कोई सवाल किए। पर जब धर्म हमारे घर में प्रवेश करता है तो लगता है जैसे श्रद्धा और अंधश्रद्धा एक-दूसरे के साथ हस्तक्षेप कर रहे हैं। 

मेरे पापा सिख धर्म के कट्टर पालक नहीं हैं किन्तु वे गुरसिखी में मानते हैं। मेरा मानना है की हम सबको अनुमति है वो सब मानने की जो हमारी आस्था मानने का अनुरोध करती है। पर समस्या वहाँ शुरू होती है जब उस आस्था को पवित्र सीख के नाम पर दूसरों पर थोपा जाता है। ऐसे कईं स्वघोषित गुरु हैं जो धर्म के नाम पर स्त्री जाती से द्वेष और पितृसत्तात्मकता सीखते हैं जो मुझे यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि कहीं धर्म भी तो एक षड्यन्त्र सिद्धांत नहीं।

किसे पता है कि राम 14 साल के वनवास के बाद घर आए थे या नहीं। किसे पता है कि ऐसा हुआ भी था या नहीं। और अगर हुआ भी था तो उन्होंने सीता को अग्नि परीक्षा देने को क्यूँ कहा था? क्या यह स्त्री के साथ स्त्री होने के लिए अमानवीय व्यवहार नहीं हुआ? धर्म की मूल आस्था समानता पर आप में से कुछ मुझे यह बाहर ज़ोर से बोलने से माना करते हैं क्योंकि हम आज जो देखते हैं वो धार्मिक प्रश्न नहीं बल्कि अपराध हैं।
 
मुझे कभी कोई अलौकिक अनुभव नहीं हुआ। पर मुझे याद है मैं एक मूल मंत्र जपती थी जब भी मैं दरी हुई होती थी या होती हूँ। क्या धर्म का एकमात्र आशय शांति ढूँढना नहीं है? पर ऐसा लगता है जैसे देवताओं के बीच प्रतिस्पर्धा है जैसे कि मेरे भगवान तुम्हारे भगवान से बेहतर हैं। इसके पीछे जो विपणन लगता है वह जितना हास्यजनक है उतना ही गंभीर भी। सैंकड़ों करोड़ों रुपये लगे जाते हैं एक ईश्वरीय/पवित्र/पुण्यमय सत्त्व का विज्ञापन करने के लिए जो मेरे मानने में आत्मा-संदेह के साथ बादलों पर बैठे एक बड़ी उम्र के पुरुष/स्त्री(किंचित ही) होते हैं। 

यह मानना कि ईश्वर सम्पूर्ण है, अपनी पूर्णता के रास्ते ढूँढने का एक तरीका है और एक उच्चतर शक्ति को ढूँढना हमारा तरीका है यह बताने का कि हम भयभीत हैं और हमें हमारा ध्यान रखने के लिए कोई चाहिए। और ऐसा सोचना संपूर्णतः मानवीय आवश्यकता है। 

भगवान मौजूद हैं या नहीं इसपर कोई बहस नहीं है। यह उस शक्ति के अस्तित्व से इनकार करने का कोई विवाद नहीं है। अपने सबसे बड़े, गहरे, अँधेरे पाप का आत्म-भाषण और एक ऐसे बाहरी माध्यम द्वारा मोक्ष जो क्षमा कर देता है, ऐसे में यह भगवान है। धर्म लोगों का नियंत्रण करने के लिए बनाए गए हैं जबकि भगवान तो बंदियों की मुकतिस्वरूप हैं। धर्म एक ऐसी आबादी के द्वारपाल हैं जिन्हें जिसे उसकी सच्चाई व मौलिकता पर सवाल उठाने का कोई अधिकार नहीं। धर्म लोगों को दंड में विश्वास दिलाते हैं और इस तरह अपने कुकर्मों के बारे में जागरूक हैं। धर्म वो तरीका है जिससे समाज एक “बड़े भाई हमें देख रहे हैं” वाले समन्वय में कम कर सकता है जबकि कोई एक आवाज़ तक नहीं उठाता।

धर्म धारणा बनाता है नरक की, हँसिये के साथ यमराज की जो उन सबका शिकार करता है जो इसे तोड़ने की हिम्मत करता है, पाप और पुण्य की। वह आम जनता में एक अति-उत्तेजित नैतिक दिशा-सूचक उत्कीर्ण करता है, वो मासूम उत्सुक अनुयायी जो मानते हैं कि एक दिन उन्हें पुरस्कृत किया जाएगा। ईश्वर हमें देख रहे हैं पर ईश्वर को कौन देख रहा है कि वे गरिमा और निष्पक्षता बरकरार रख रहे हैं की नहीं? धर्म हमारे लिए वो करते हैं। धर्म भगवान के लिए भी वही करते हैं। और हम ऐसे जीते हैं जैसे इससे हमें कोई तकलीफ नहीं।


धर्म से मेरा सामना

Translated by Aarohi Vaidya

Aarohi is an English literature student. She writes poems and weaves stories that rarely make it to paper. She translates in three languages. She’s been a Blahcksheep all her life. She’s a shout in the void, a beam from across the canopy.

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