अकेला

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Artwork by Shubhshree Mathur

यह उसके लिए जो अकेला है

कि अकेले तो सभी हैं

हम दो हमारे दो में भी चारों अकेले हैं

एक रसोई में, एक दफ्तर में, 

एक स्कूल में, एक कॉलेज में

60 की क्लास में भी सब अकेले हैं

एक गणित में, हिंदी में, 

एक अंग्रेजी में, एक भूगोल में

लोकल बस की भीड़ में अकेले का टिकट लेते हैं

डिस्को में हजारों के बीच 

कितने ही अकेले मन झूमते हैं

मेहनत करने पर अव्वल भी अकेले ही आते हैं

मेहनत ना करें तो आखिरी भी अकेले ही आते हैं

अपनी शादी में दूल्हा अकेले ही पीछे घोड़ी पर आता है

जनाज़े में सब खड़े हैं तू अकेला ही तो लेट कर जाता है

उंगली का नाखून अकेला ही कट जाता है

पर पलक का बाल अकेला ही सब इच्छाएं उठाता है

चेहरे पर अकेला तिल खूबसूरती बताता है

सर में अकेला सफेद बाल तजुर्बा बन जाता है

धूल का अकेला कण आंखों में पानी लाता है

अकेला अंगारा पूरा जंगल झुलसाता है

जो कमजोर है वो अकेला

जो बलशाली वो भी

जो अनोखा वो अकेला

जो आम वो भी

जो जोड़े में हैं

वो अकेले एक दूसरे पर हावी हैंतू अकेला है क्योंकि तू अकेला ही काफी है


shubhsree

Shubhshree Mathur

Shubhshree is a storyteller and design educator from Kota, Rajasthan currently based in Bangalore. She is a tea lover, bibliophile and as outgoing as a houseplant. Being a professional illustrator, she predominantly uses visual and text together to create meaning and conversations from the mundane around her. Her personal context finds refuge in things like a clothes pin or bathroom slipper, and that is the kind of vernacular association that makes the writing awkwardly relatable. During her industry experience of 7-8 years, she has also delved into research, branding and writing. She hopes to write and make her own books someday!

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