कार्यक्षेत्र पर जाति: क्यों व्यापरसंधों का जाति के प्रति सचेत होना अनिवार्य हो

#Translation #Hindi

You can read the original piece titled ‘Caste at the Workplace: Why Corporates Need to Recognise Caste’ by Aahil Sheikh in English here. This is a translation in Hindi.

The original piece rejected by a leading Indian organisation because it was deemed “too sensitive” for its core audience and key stakeholders. 

Caste and the Workplace: The Need for Corporates to Recognise Caste
Illustration by Christina Spano

2020 की ग्रीष्म ऋतु के दौरान हैशटैग ब्लैक लाइव्स मैटर लोगो की सामाजिक व व्यावसायिक ज़िंदगी में प्रवेश कर चुका था | 13,000 किलोमीटर दूर अफ़्रीकी-अमेरिकी समुदाय के खिलाफ हो रहे भेदभाव के पक्ष में भारतीय चर्चित हस्तियों द्वारा भी कई ट्वीट किए गए। इन्हीं लोगों द्वारा हमें हाथरस में हुए घटनाक्रम पर पक्षपाती व्यवहार देखने को मिला। यहां पर दलित लाइव्स मैटर के पक्ष में एक्टिविस्ट द्वारा सहयोग की मांग की गई, परंतु उसका कोई असर देखने को नहीं मिला।

भारत पीढ़ियों से जातिवाद नामक बीमारी और उसकी सामाजिक सोपान प्रणाली से ग्रस्त है। भारतीय पूंजीपतियों ने कई सामाजिक संदेशों को अपनी ब्रांडिंग के तहत या फिर सीएसआर मैंडेट के तहत आत्मसात किया है, फिर भी जाति हमेशा से ही उनके लिए एक संवेदनशील मुद्दा रहा। यदि इन्हें सही अर्थों में मुख्तलिफ होना है, तो इन्हें दलित लाइव्स मैटर का साथ देना ही होगा। 

जाति एक अदृश्य पहचान के रूप में: ‘ वस्तुपरक नियुक्तियों का आचरण ‘

समावेशिता का प्रश्न विशेषाधिकार के विचार से जुड़ा हुआ है। एक पुरुष जिसका जन्म से पुरुष लिंग निर्धारित है, वह उन राहों पर भी पहुंच रख सकता है जो किसी महिला, non-cis पुरुष, या LGBTQIA+ समुदाय के किसी अन्य सदस्य के लिए वर्जित हैं। इन विशेषाधिकारों की पहचान ही बेहतर बनने की हमारी सोच को बल प्रदान करती है। किसी के लिंग या त्वचा का रंग को हम बाहरी पहचान चिन्हों के रूप में और किसी का धर्म, जाति या लैंगिक झुकाव को अदृश्य पहचान के रूप में जानते हैं।

यहाँ जानना महत्वपूर्ण रहेगा कि किसी की सामाजिक स्थिति (जाति के अनुसार) अकसर उसकी सामाजिक गतिशीलता को सीमित करती है। ऐसे में जब नियुक्तियों का आचरण किसी की अंग्रेज़ी भाषा पर मज़बूत पकड़, विख्यात विश्वविद्यालयों से डिग्री, एवं उसके चेहरे से टपकते आत्मविश्वास के इर्द गिर्द घूमता हो, तब सवाल खड़े होते हैं की ये नियम कितने वस्तुपरक हैं। 2007 में सुरिंदर एस. जोधका एवं केथरिन न्यूमैन के एक अध्ययन के अनुसार, कुछ नियुक्तिकर्ताओ का मानना था कि ऊंची जाति के लोग विशिष्ट कम्पनियों के लिए ज़्यादा उपयुक्त रहते हैं। अश्विनी देशपांडे एवं केथरिन न्यूमैन का एक और अध्ययन आरक्षित  व अनारक्षित अभ्यर्थियों का ग्रेजुएट होने के पश्चात नौकरी प्राप्त करने की अपेक्षित समयावधि को बताता है। 

पॉल अटवेल और सुखदेव थोराट के एक अध्ययन के अनुसार, दलित अभ्यर्थियों के पास नियुक्ति में सफलता के सिर्फ 67% सकारात्मक मौके होते हैं किसी ऊंची जाति के अभ्यर्थी की तुलना में, जबकि मुस्लिम अभ्यर्थियों के लिए यह आंकड़ा सिर्फ 33% है। इसी अध्ययन के अनुसार स्थानीय कारण और पूर्वाग्रह एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि जैसे कारण भी नियुक्ति की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। द वायर के एक आर्टिकल के अनुसार ज्यादातर दलित अभ्यर्थी प्राइवेट नौकरियों में आवेदन करने से हिचकिचाते हैं क्योंकि उनके पास एक सुदृढ़ नेटवर्क तंत्र और सन्दर्भों की कमी होती है, अतः उन्हें यह व्यर्थ लगता है।

जाति एवं कार्य संस्कृति

ओल्ड बॉयज क्लब’ नामक धारणा आपने सुनी होगी। यह महिलाओं को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है। इसी से मिलती हुई संवृति जातीय संबंधों और ‘कल्चर फिट’ होने के आस – पास घटित होती है। उपनाम जातिसूचक हो सकते हैं, और यह देखा गया है कि अकसर सहकर्मी एक दूसरे को उपनाम से ही पुकारते हैं, जो उनके उच्च जाति होने की पहचान में सुविधापूर्वक रूप से रमने का सामाजिक प्रमाण है। यही सुविधा किसी दलित कर्मचारी, जो अपना उपनाम भेदभाव होने के डर से इस्तेमाल न करता हो, के पास उपलब्ध नहीं होती। अकसर जाति और आरक्षण संबंधी चर्चाएं उच्च जाति कर्मचारियों द्वारा दलित सहकर्मी पर शब्द-प्रहार एवं ‘मेरिट’ की धारणा को कोसने पर अंत होती हैं।

सिस्को जातीय अभियोग (Cisco lawsuit) ने विदेशी व्यापारसंध में जाति की समस्या को उजागर किया है। यह केस सिलिकॉन वैली में एक कार्यरत दलित कर्मचारी के बारे में है, जिसे उसके उच्च जातीय सहकर्मियों द्वारा मानसिक उत्पीड़न झेलना पड़ा। परिणामस्वरूप पीड़ित को अन्यायपूर्ण आचरण का सामना करना पड़ा एक ऐसे कार्यस्थल पर, जहाँ सिर्फ उच्च जाति के लोग ही कार्यरत थे, क्योंकि जब उसने यह समस्या एचआर से साझा की, उसकी शिकायत को गैर-कानूनी करार दे दिया गया।

यह इसलिए हुआ क्योंकि कंपनी नियमों के अंतर्गत भेदभाव के मामलों में जाति का निर्धारक सम्मिलित ही नहीं होता। विदेश में कार्यरत दलित कर्मचारियों के ऐसे वर्णन भी हैं जो यह बताते हैं कि चाहे मल्टीनेशनल कंपनी भारतीय हो या कोई और, वे जाति को अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा नहीं मानते अतः जाति आधारित भेदभाव पर कोई रोक नहीं है। सिस्को अभियोग ज़रूर जातीय भेदभाव पर चर्चा के रास्ते खोलता है परंतु इससे यह बात नही बदलती कि दशकों से जातीय मुद्दों को हमेशा तिरस्कार ही मिला है। 2018 की इक्वालिटी लैब्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, 67% दलितों ने कहा कि उन्हें कार्यस्थल पर भेदभाव का सामना करना पड़ता है। 

उच्च प्रबंधन एवं जाति: क्रमोन्नति पर इसका असर कैसा है?

वेतन-संबंधी और नौकरी-संबंधी भेदभाव ऐसे दो  पहलू हैं, जो बताते है कि कैसे समान रूप से योग्य दलित कर्मचारी एवं उच्च जाति के कर्मचारियों के साथ अलग – अलग व्यवहार होता है। एक 2012 के अध्ययन के अनुसार 93% भारतीय व्यापारसंध बोर्ड के सदस्य उच्च जाति से आते हैं। उसी से मिलते हुए एक 2019 के अध्ययन से यह बात सामने आई कि कैसे अधिकांश मर्जर और एक्विजिशन (M & A) समान जाति के निदेशकों के बीच ही होते हैं। उसी अध्ययन का एक अंश प्रस्तुत है –

“वे भारतीय जो बड़े व्यापारसंधो के निर्देशक पद पर पहुंच चुके हैं, उनसे उम्मीद की जाती है कि वे जातिगत पूर्वाग्रहों को छोड़ चुके होंगे। परंतु यह सच नहीं है। हमारा शोध किसी जातिगत भेदभाव को उजागर नहीं करता अपितु  घनिष्ट की ओर झुकाव की प्रवृत्ति की तरफ संकेत करता है। व्यापरसंधों की पारस्परिक क्रियाएं जाने-अनजाने, एक जैसे जाति समूहों में ही पाई जाती है।”

एक ऐसे समय पर, जब उच्च प्रबंधन एवं वरिष्ठतम संगठन उच्च जाति सदस्यों से बने हों जो दलितों के प्रति पूर्वाग्रहों से ग्रसित हों, दलितों के लिए सामाजिक व्यवस्था में ऊपर उठना मुश्किल होता है। इन सब में, नियुक्तियों में व्यक्तिपरक होते नियम, अंग्रेज़ी भाषा पर पकड़ की अनिवार्यता, ‘कल्चर फिट’ होने की कवायद, एवं वरिष्ठता के मेरिट की धारणा — यह सारे कारण एक व्यक्ति के क्रमोन्नत होने की संभावनाओं को बताते हैं।

बेहतर कैसे करें: अंबेडकर  के सिद्धांत

विविधता व्यापार के लिए अच्छी है। यह विचार मकिंसे की हाल ही में आई ‘डायवर्सिटी विन्स’ रिपोर्ट भी रखती है। कारण सीधा है— लोगों की विविध पृष्ठभूमि और अनुभव हमें एक ऐसा दृष्टिकोण दे सकती है जो बिलकुल नया और अनोखा हो। वे कैसे समस्याओं को देखते हैं, उनके समस्याओं को सुलझाने के तरीकों में किस प्रकार भिन्नता पाई जाती है— कुछ ऐसा जो हमें लिंग के संदर्भ में भी देखने को मिलता है, जैसे कुछ कार्यों को महिलाएं बेहतर ढंग से करती हैं, तो कुछ को पुरुष। कार्यक्षेत्र में विविधता और समावेशिता यदि सभी सोपानों पर पाई जाती है, तो वह न सिर्फ सामाजिक न्याय के महत्व में योगदान देती है अपितु कंपनी की कार्यक्षमता और सामाजिक धारणा को भी सुदृढ़ बनाती है।

अंबेडकर सिद्धांत’ (The Ambedkar Principles) एक ऐसी विचारधारा है जो प्राइवेट सेक्टर में जातिगत भेदभाव को कम करने में सहायक है। कुछ सिद्धांत यहाँ प्रस्तुत हैं—

  1. दलित कर्मचारियों और संभावित पदानवेशियों को प्रशिक्षण के अवसर प्रदान किए जाएं, जिसमें अंग्रेज़ी भाषा में निपुणता का प्रशिक्षण, जिससे दलित कर्मचारी अपना सही सामर्थ्य प्राप्त कर सकें। जहां भी हो सके दलित कार्मिकों की संख्या के टारगेट रखे जाएं।
  2. सक्रिय रूप से स्थानीय उद्यम, विशेषकर  सामाजिक रूप से अपवर्जित समुदायों का आपूर्ति और /या सेवा कॉन्ट्रैक्ट का समानुपात बनाया जाए। दलित एवं मुस्लिम स्वामित्व वाले व्यापारों से आपूर्ति को प्रोत्साहन देकर संगठित प्राइवेट क्षेत्र सूक्ष्म, छोटे, व मध्यम  उद्यमों को बल प्रदान कर सकते हैं।
  3. उचित व न्यायपूर्ण नियुक्ति, चयन व विकास प्रक्रियाएं, जिनके वस्तुपरक मानदंड हों, और जिनकी कार्यविधि की संविक्षा सिविल सोसाइटी समूहों व स्वयं दलित समुदाय के लिए खुली रहे।
  4. कार्यक्षेत्रों पर दलितों के साथ अन्याय व भेदभाव की स्थिति में परीक्षण के लिए ‘दलित डिस्क्रिमिनेशन चेक’ जैसे संसाधन उपयोग किए जाएं।

इसके अतिरिक्त, यदि स्थितियों में बदलाव चाहिए, तो भारतीय व्यापारसंधों को जाति विमुख होने के बजाय अधिक से अधिक जाति अभिज्ञ होने की आवश्यकता है। सीएसआर का दायरे में ऐसे मापदंडों को शामिल किया जाए जिससे कुछ समुदायों को अलग रखने की प्रवृत्तियों पर लगाम लगाई जा सके। अंबेडकर सिद्धांतों को अपनाने से व्यापारसंध स्वयं को जाति अभिज्ञ होने की राह पर एवं कार्यस्थल पर अंतर्निहित पूर्वाग्रहों को पहचानने में सक्षम हो सकेंगे। इसके साथ ही जो कार्मिक विशेषाधिकृत पृष्ठभूमि से हैं वे कार्यस्थल पर एक ऐसी शब्दावली का प्रयोग करें जिससे दलित कार्मिकों को शर्मिंदगी का सामना न करना पड़े। एचआर एवं D & I प्रबंधक मेरिट के मिथक व विशेषाधिकार जैसे विषयों पर चर्चाएं प्रारम्भ करें। यह 2021 है, यह वह वक्त है कि जाति एक विविधता एवं समावेशिता का अनिवार्य हिस्सा बने।


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Translated by Himani

Himani is an independent research scholar, content creator and academic writer. She has taught English Literature and Communication skills to undergraduate students of diverse backgrounds. She has a knack for good grammar, Indian Literature and Emily Dickinson’s poetry. What makes her a Blahcksheep is her leanings towards the nuances of “taboo” topics in Indian society and diverse feminist perspectives surrounding our age and culture.

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